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उधमसिंह नगर

और अपनी कुर्सी नहीं बचा पाए आईपीएस मणिकांत मिश्रा। किसान सुखवंत आत्महत्या के बाद से लगातार उठ रही थी हटाने की मांग।क्राइम कंट्रोल में रहे फेल, मीडिया से दोहरी नीति भी रही मुख्य वजह।

नरेन्द्र राठौर(खबर धमाका)। एसएसपी ऊधमसिंहनगर मणिकांत मिश्रा की आखिर छुट्टी हो गई है, पिछले माह काशीपुर के किसान सुखवंत आत्महत्या कांड के बाद लगातार उन्हें हटाने की मांग उठ रही थी। मरने से पहले सुखवंत की वीडियो सभी ने सुनी भी होगी, इसके साथ उनका ऊधमसिंहनगर डेढ़ वर्ष का कार्यकाल हमेशा विवादों में रहा, पत्रकारों से उनकी दूरियां भी कहीं न कहीं इसकी मुख्य बजह रही। मणिकांत को सबसे बड़ी सजा यह भी मिली की उनका डिमोशन करके अब एसएसपी से एसपी बनाकर दूसरी जगह तैनाती दी है।

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मणिकांत मिश्रा की बात करें तो पीपीएस से आईपीएस में प्रोन्नति होकर ऊधमसिंहनगर के कप्तान बने थे। उनकी यह पर पहले ही दिन बदमाशों ने गोलियों की तड़तड़ाहट से स्वागत किया था, इसके बाद वह कानून व्यवस्था को पटरी में लाने में फेल होते चले गए, ऊधमसिंहनगर में कप्तान बनने के कुछ दिनों बाद उन्होंने एक शोसल मीडिया के पत्रकार के साथ सवाल पूछने पर हिटलरशाही जैसा व्यवहार किया,जिसकी जमकर निंदा हुई। निकाय चुनाव में भी उन्होंने राजनीति दबाव में तीन पत्रकारों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर साबित कर दिया की वह कैसे कप्तान हैं। इसके बाद उन्होंने मीडिया से दूरियां बना ली, अपने कार्यकाल के दौरान वह चंद चापलूसों में घिरे रहे।

इधर पिछले माह काशीपुर के पैगा निवासी किसान सुखवंत की आत्महत्या से पहले की वीडियो ने सभी को झकझोर कर रख दिया। सुखवंत ने मौत के गले लगाने से पहले जो वीडियो बनाई थी, उसमें मणिकांत मिश्रा की पूरी सच्चाई छिपी थी, इसके बाद मृतक के परिजन, किसान संगठन,विपक्ष और खुद भाजपा विधायक अरविंद पाण्डेय ने एसएसपी को हटाने और उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज करने तक की मांग की थी। कप्तान ऐसी कप्तानी कर रहे थे कि हल्द्वानी में हुई घटना की रिपोर्ट ऊधमसिंहनगर के थाने में दर्ज करवा दी,जो उनके गले की फांस बन गई। बाजपुर के पत्रकार गोल्डी निर्भीक हो या फिर काशीपुर के पत्रकार हिमांशु ठाकुर, दोनों के खिलाफ दर्ज मुकदमा और दमन मणिकांत मिश्रा के कार्यकाल में देखने को मिला है,

जबकि अपराध और अपराधियों की बात करें तो खुलेआम,खुली छुट मिली थी। चोरी, हत्या,रेप, मारपीट और गोलियों की तड़तड़ाहट हर दिन नजर आ रही थी।

कुछ नेताओं की कठपुतली बनने का खामियाजा भी कहीं न कहीं उन्हें भुगतान पड़ा है।