उधमसिंह नगर

प्रधानमंत्री को पत्र भेजकर उठाई सनातन धर्म में समानता लाने की मांग 

रुद्रपुर(खबर धमाका)। सीताराम सेना के केंद्रीय अध्यक्ष ईश्वरी प्रसाद राठौर व केंद्रीय महासचिव मिंटू जौहरी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र भेजकर देश सताधन धर्म में पूर्व की भांति वर्ण व्यवस्था लागू करने की मांग की है।

पीएम मोदी को भेजें पत्र में कहा गया कि भारत का प्राचीन समाज सनातन धर्म पर आधारित था, जिसका मूल उद्देश्य था – सत्य, अहिंसा, धर्म, करुणा और समानता।

किन्तु , समय के साथ इसमें सामाजिक ढाँचे के रूप में वर्ण व्यवस्था और बाद में जाति व्यवस्था विकसित हुई।

इन दोनों के अर्थ और उद्देश्य में गहरा अंतर है।

2. वर्ण व्यवस्था का मूल स्वरूप

वैदिक काल में समाज के कार्यों को व्यवस्थित करने के लिए बनाई गई थी। इसका आधार गुण (स्वभाव) और कर्म (कार्य) था, न कि जन्म।

चार वर्ण थे —

1. ब्राह्मण – ज्ञान, शिक्षा और पूजा के कार्य हेतु।

2. क्षत्रिय – रक्षा, शासन और वीरता के कार्य हेतु।

3. वैश्य – व्यापार, कृषि और आर्थिक व्यवस्था हेतु।

4. शूद्र – सेवा, श्रम और समाज की सहायता हेतु।

भगवद गीता (अध्याय 4, श्लोक 13) में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा —

> “चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।”

अर्थात् — चार वर्णों की रचना गुण और कर्म के अनुसार हुई है।

इससे स्पष्ट है कि वर्ण व्यवस्था कर्मप्रधान थी, जन्मप्रधान नहीं।

जाति व्यवस्था का जन्म

समय के साथ समाज में वर्ण व्यवस्था विकृत होकर जाति व्यवस्था में बदल गई।

अब व्यक्ति की पहचान उसके कर्म या गुण से नहीं, बल्कि जन्म से तय होने लगी।

इससे समाज में ऊँच-नीच, छुआछूत और भेदभाव जैसी बुराइयाँ फैल गईं।

जो पहले कार्य विभाजन था, वह मानव विभाजन बन गया।

धर्मग्रंथों की दृष्टि

वेदों और उपनिषदों में कहीं भी जातिगत भेदभाव का समर्थन नहीं है।

वहाँ आत्मा की एकता और समभाव की बात की गई है —

> “एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति।” (ऋग्वेद)

अर्थात् — सत्य एक है, ज्ञानी उसे अनेक रूपों में कहते हैं।

सनातन धर्म की आत्मा यह है कि सभी प्राणी एक ही परमात्मा के अंश हैं।

5. संतों और सुधारकों की भूमिका

जब जाति व्यवस्था ने समाज को बाँटना शुरू किया,

तो अनेक संत —संत कबीर दास जी, संत रैदास जी, संत तुलसीदास जी,संत गुरु नानक देव जी, संत महात्मा बुद्ध जी, संत स्वामी विवेकानंद जी , संत डॉ भीमराव अंबेडकर जी आदि ने इसका विरोध किया।

उन्होंने कहा कि धर्म का मूल उद्देश्य मानव समानता है, न कि भेदभाव।

“आधुनिक दृष्टिकोण”

आज का भारत संविधान के अनुसार समानता, स्वतंत्रता और न्याय पर आधारित है।

संविधान ने जातिगत भेदभाव को अवैध और अनैतिक घोषित किया है।

सनातन धर्म की सच्ची भावना भी यही है — सबका कल्याण, सबका सम्मान।

सनातन धर्म का उद्देश्य कभी भी जातिगत ऊँच-नीच बनाना नहीं था।

मूल रूप में वर्ण व्यवस्था कर्म आधारित सामाजिक संगठन था,

परंतु बाद में यह जन्म आधारित जाति व्यवस्था में बदलकर समाज के पतन का कारण बनी।

👉 इसलिए आज आवश्यकता है कि हम

सनातन धर्म के असली स्वरूप — समानता, करुणा और कर्मप्रधान जीवन —

को अपनाएँ, और जन्म पर आधारित भेदभाव को त्यागें।

इसलिए सनातन धर्म की धार्मिक ग्रंथो में ऊंच और नीच की भावना जो आसामाजिक तत्वों द्वारा भर दी गई थी उसको शुद्धीकरण हेतु जनसंख्या के अनुपात में दलित, ओबीसी और सामान्य वर्ग से संत महापुरुषों की टीम बनाकर, गठित टीम द्वारा धार्मिक ग्रंथो में संशोधन कर वर्णित वर्ण व्यवस्था कर्म के आधार पर लागू कराई जाए ताकि सनातन धर्म का विस्तार होते हुए सभी धर्म प्रेमी हिल मिलकर रहे और भारत विश्व गुरु की ख्याति प्राप्त करने के प्रति अग्रसर हो सके।

अतः आपसे निवेदन करता हूं कि आप सनातन धर्म का गौरव वापस दिलाने में पूर्ण सहयोग प्रदान करने का कष्ट करेंगे। जय जय श्री सीताराम, हर हर महादेव, भारत माता की जय,वंदे मातरम।