*मेरा रेशम–मेरा अभिमान 2.0” के तहत जागरूकता कार्यक्रम आयोजित, किसानों को वैज्ञानिक रेशम उत्पादन की दी जानकारी*
औरैया(खबर धमाका)। “मेरा रेशम–मेरा अभिमान 2.0” कार्यक्रम के अंतर्गत रविवार को राजकीय रेशम फार्म, भैंसोल, औरैया में रेशम कृषकों के लिए जागरूकता एवं तकनीकी प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य किसानों को रेशम की खेती एवं रेशमकीट पालन की आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों से अवगत कराना तथा रेशम उत्पादन को किसानों की आय बढ़ाने के प्रभावी माध्यम के रूप में विकसित करने के लिए प्रेरित करना रहा।
कार्यक्रम के संयोजक केंद्रीय रेशम बोर्ड के डॉ छत्रपाल, वैज्ञानिक-डी ने किसानों को रेशम उत्पादन की विभिन्न तकनीकों के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि रेशम उत्पादन एक महत्वपूर्ण कृषि आधारित गतिविधि है, जिसमें शहतूत की वैज्ञानिक खेती, गुणवत्तापूर्ण पत्ती उत्पादन, रेशमकीट पालन, कोकून उत्पादन एवं विपणन शामिल हैं। उन्होंने कहा कि शहतूत की अच्छी एवं पौष्टिक पत्तियाँ स्वस्थ रेशम कीट पालन और बेहतर कोकून उत्पादन की आधारशिला हैं। वैज्ञानिक छत्रपाल ने किसानों को शहतूत की खेती के महत्व एवं वैज्ञानिक विधियों की जानकारी देते हुए पौधरोपण, उचित दूरी, सिंचाई, खाद एवं उर्वरक प्रबंधन, कटाई-छंटाई तथा गुणवत्तापूर्ण पत्ती उत्पादन के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने शूट रियरिंग तकनीक के बारे में भी जानकारी देते हुए बताया कि वैज्ञानिक विधि से शूट रियरिंग अपनाकर श्रम एवं समय की बचत के साथ रेशमकीटों को गुणवत्तापूर्ण पत्तियाँ उपलब्ध कराई जा सकती हैं। उन्होंने किसानों को वैज्ञानिक तरीके से रेशमकीट पालन, कीटशाला की स्वच्छता एवं विसंक्रमण, तापमान एवं आर्द्रता प्रबंधन, पर्याप्त वायु संचार तथा रोगों की रोकथाम के संबंध में महत्वपूर्ण तकनीकी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि रेशमकीट पालन में स्वच्छता एवं रोग प्रबंधन का विशेष महत्व है। स्वस्थ बीज, गुणवत्तापूर्ण शहतूत पत्ती तथा स्वच्छ कीटपालन भवन बेहतर कोकून उत्पादन के लिए आवश्यक हैं। किसानों को यह भी बताया गया कि रोगग्रस्त कीटों को समय से अलग करना तथा पालन गृह की नियमित सफाई एवं विसंक्रमण करना रोगों के प्रसार को रोकने में अत्यंत उपयोगी है। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि जनता कॉलेज बकेवर के पादप रोग विज्ञान के विभागाध्यक्ष डॉ. मनोज यादव ने अपने संबोधन में किसानों की आय बढ़ाने के लिए रेशम उत्पादन को कृषि के साथ जोड़ने पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता है कि किसान पारंपरिक फसलों के साथ ऐसी कृषि आधारित गतिविधियों को भी अपनाएँ, जिनसे अतिरिक्त आय एवं रोजगार के अवसर प्राप्त हों। रेशम उत्पादन इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण विकल्प है।
डॉ. यादव ने कहा कि रेशम उत्पादन केवल रेशमकीट पालने तक सीमित नहीं है, बल्कि शहतूत की खेती से लेकर कोकून उत्पादन, प्रसंस्करण एवं विपणन तक रोजगार और स्वरोजगार की व्यापक संभावनाएँ उपलब्ध कराता है। उन्होंने किसानों को वैज्ञानिक तकनीक अपनाकर गुणवत्तापूर्ण उत्पादन करने तथा विभागीय विशेषज्ञों से प्रशिक्षण एवं तकनीकी मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि किसान छोटे स्तर से शुरुआत कर अपने अनुभव एवं उत्पादन के आधार पर धीरे-धीरे रेशम उत्पादन का विस्तार कर सकते हैं। उन्होंने विशेष रूप से कहा कि “अच्छी शहतूत की पत्ती, स्वस्थ रेशमकीट, स्वच्छ कीटपालन भवन और वैज्ञानिक पालन प्रबंधन, बेहतर कोकून उत्पादन की मजबूत नींव हैं।” कार्यक्रम का सफल संचालन प्रेम नारायण ने किया ।कार्यक्रम में राजकीय रेशम विभाग के राघवेंद्र यादव, मोहित सिंह, पवन कुमार, गौरव प्रताप, सचिन कुमार, राघवेंद्र सिंह सहित लगभग 60 रेशम कृषकों ने सक्रिय रूप से सहभागिता की। कार्यक्रम के दौरान किसानों ने रेशम की खेती, शहतूत पौधरोपण, शूट रियरिंग, रेशमकीट पालन, कीटपालन गृह की स्वच्छता एवं विसंक्रमण, रोग प्रबंधन तथा कोकून उत्पादन से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त कीं। किसानों ने विशेषज्ञों से विभिन्न तकनीकी विषयों पर चर्चा कर अपनी जिज्ञासाओं का समाधान भी प्राप्त किया। कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों को आधुनिक एवं वैज्ञानिक रेशम उत्पादन तकनीकों से जोड़ना, रेशम की खेती के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा इसे किसानों की आय वृद्धि, ग्रामीण रोजगार एवं स्वरोजगार के प्रभावी माध्यम के रूप में विकसित करना रहा। कार्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।
