ओलावृष्टि से बर्बाद फसलों पर किसानों को ₹50,000 प्रति एकड़ मुआवजा दे सरकार : तिलक राज बेहड़* *किसानों की मेहनत और लागत को देखते हुए मुआवजे की दरों में तत्काल संशोधन की मांग*
रुद्रपुर(खबर धमाका)। किच्छा विधानसभा क्षेत्र के विधायक तिलक राज बेहड़ ने 9 अक्टूबर को हुई ओलावृष्टि से किसानों की फसलों को हुए नुकसान पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए राज्य सरकार से प्रभावित किसानों को ₹50,000 प्रति एकड़ की दर से मुआवजा देने की मांग की है। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक आपदा के कारण किसानों की महीनों की मेहनत और खेती पर लगाई गई पूंजी बर्बाद होने की आशंका है। ऐसे समय में सरकार को किसानों के साथ खड़े होकर उन्हें तत्काल आर्थिक राहत प्रदान करनी चाहिए।
विधायक बेहड़ ने कहा कि ओलावृष्टि से प्रभावित क्षेत्रों में तत्काल कृषि विभाग एवं राजस्व विभाग की संयुक्त टीमों के माध्यम से सर्वे कराया जाए। प्रत्येक प्रभावित किसान की फसल को हुए वास्तविक नुकसान का निष्पक्ष आकलन किया जाए, ताकि कोई भी पात्र किसान सरकारी सहायता से वंचित न रहे। उन्होंने सरकार से यह भी मांग की कि सरकार द्वारा तत्काल कैबिनेट की बैठक बुलाकर पूर्व में निर्धारित मुआवजे की दरों में तत्काल संशोधन किया जाए और वर्तमान परिस्थितियों एवं खेती की बढ़ती लागत को ध्यान में रखते हुए किसानों को पर्याप्त मुआवजा दिया जाए।
बेहड़ ने कहा कि जुताई से लेकर बुवाई और फसल की देखभाल तक किसान को प्रति एकड़ लगभग ₹25,000 से ₹30,000 का खर्च करना पड़ आता है। इसके अतिरिक्त कटाई, ढुलाई तथा अन्य खर्च भी किसानों पर आर्थिक बोझ बढ़ाते हैं। सरकार द्वारा कृषि लागत के आकलन में प्रति एकड़ लगभग ₹60,000 से ₹65,000 किसान को प्राप्त होता है । ऐसे में यदि प्राकृतिक आपदा के कारण फसल बर्बाद हो जाती है, तो किसान को होने वाला नुकसान केवल उसकी फसल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसकी पूरी मेहनत, पूंजी और आगामी खेती की तैयारी भी प्रभावित होती है।
बेहड़ ने मांग की कि ओलावृष्टि से जिन किसानों की फसलों को नुकसान हुआ है, उनका कृषि ऋण तत्काल माफ किया जाए। साथ ही, आगामी रबी की फसल की बुवाई के लिए प्रभावित किसानों को बीज और खाद निःशुल्क उपलब्ध कराई जाए, ताकि आर्थिक संकट के बावजूद वे समय पर अपनी अगली फसल की बुवाई कर सकें।
उन्होंने कहा कि खेती करना आज किसानों के लिए लगातार महंगा होता जा रहा है। धान की फसल तैयार करने के लिए किसान को खेत की जुताई, जमीन की तैयारी, बीज, बुवाई, खाद, कीटनाशक दवाइयों, सिंचाई, डीजल, मजदूरी, निराई-गुड़ाई और फसल की देखभाल सहित अनेक कार्यों पर पैसा खर्च करना पड़ता है। इसके बाद भी प्राकृतिक आपदाओं के कारण फसल सुरक्षित रहने की कोई गारंटी नहीं होती। किसान अपनी जमा-पूंजी लगाने के साथ-साथ बैंकों, सहकारी समितियों और अन्य स्रोतों से कर्ज लेकर खेती करता है। यदि फसल खराब हो जाती है, तो उसकी पूरी आर्थिक व्यवस्था चरमरा जाती है।
उन्होंने कहा कि किसान पूरे साल अपनी फसल को तैयार करने के लिए दिन-रात मेहनत करता है। कभी मौसम की मार, कभी अतिवृष्टि और कभी ओलावृष्टि उसकी उम्मीदों पर पानी फेर देती है। किसान की फसल नष्ट होने का अर्थ केवल खेत में खड़ी फसल का नुकसान नहीं, बल्कि उसके परिवार की आर्थिक सुरक्षा, बच्चों की पढ़ाई, घरेलू जरूरतों और कर्ज की अदायगी पर भी संकट आना है। इसलिए किसानों को मिलने वाला मुआवजा ऐसा होना चाहिए, जिससे उन्हें वास्तविक राहत मिल सके और वे दोबारा खेती करने की स्थिति में आ सकें।

